काशी का इतिहास | History of Kashi

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महादेव की नगरी काशी

विश्व के सबसे प्राचीन शहरो में से एक, आध्यात्म और आस्था की नगरी काशी। हिन्दू पुराणों के अनुसार काशी नगरी 5000 वर्ष प्राचीन है, जो भगवान शिव के द्वारा बनाई गई है ।

एक कथा के अनुसार जब भगवान शंकर पार्वती जी से विवाह करने के बाद कैलाश पर्वत पर रहने लगे, तब पार्वती जी के मन में पृथ्वी पे रहने की इच्छा हुयी और उन्होंने अपने मन की बात शिव जी को बताई। 

पार्वती जी की यह बात सुनकर भगवान शिव ने काशी नगरी का निर्माण किया और कैलाश पर्वत को छोड़ कर, काल भैरव के रूप में यहाँ पर रहने लगे, इसीलिए उनको इस नगर का रक्षक भी माना जाता है। 

गंगा नदी के किनारे बसे इस नगर का उल्लेख स्कन्द पुराण, रामायण, महाभारत एवं प्राचीनतम वेद ऋग्वेद सहित कई हिन्दू ग्रन्थों में आता है।

पुराणों में लिखा गया है कि काशी भगवान् शिव के त्रिशूल पर स्थित है तथा जब पृथ्वी बनी तो सब से पहले प्रकाशपुंज की रोशनी काशी पे ही पड़ी। ऐसी भी मान्यता है कि वरुणा और असी नदियों के बीच स्थित होने से इस नगर का नाम वाराणसी हुआ। 

काशी का इतिहास 3500 साल पहले से ही प्रलेखित है। आदि शंकराचार्य ने काशी को भारतीय संस्कृति एवं आर्य धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया, काशी में आज भी यही सांस्कृतिक परंपरा चली आ रही है। तुलसीदास जी ने काशी में श्री हनुमान चालीसा और श्री रामचरितमानस की रचना की। यदि दिल्ली भारत की राजधानी है, तो वाराणसी इसकी आध्यात्मिक राजधानी  है। 

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, यह माना जाता है कि अगर काशी में किसी की मृत्यु हो गई या उनका अंतिम संस्कार किया गया तो उनकी आत्मा स्वर्ग चली जाती है और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इस सन्दर्भ में एक कथा कही गयी है एक बार भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को भगवान शिव का सामर्थ्य जानने की जिज्ञासा हुई। भगवान शिव ने उज्ज्वल प्रकाश का रूप धारण किया जो आकाश से लेकर  पाताल तक था। उन्होंने भगवान विष्णु और ब्रह्मा को प्रकाश का स्रोत और अंत खोजने के लिए कहा। बहुत प्रयत्न के बाद भी वे प्रकाश का स्रोत और अंत नहीं पा सके। भगवान  विष्णु ने हार मान ली, लेकिन ब्रह्मा जी ने हार स्वीकार नही किया,उन्होंने झूठ बोला की उनको प्रकाश का अंत मिल गया और साक्ष्य के लिए केतकी के पुष्प से पूछने के लिए कहा, जो की भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित था, पुष्प ने भी झूठ बोला, जिससे शिव क्रोधित हो गए तथा काल भैरव के रूप में प्रकट हुए और ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि वह पृथ्वी पर कभी भी पूजे नहीं जाएंगे और उनका पांचवा सिर भी काट दिया एवम पुष्प को श्राप मिला की वो शिव जी के पूजा में उपयोग नहीं किया जायेगा। ब्रम्हा जी का पाँचवाँ सिर काल भैरव के बाएँ हाथ से चिपक गया। उन्होंने सिर को हटाने का बहुत प्रयास किया किन्तु सभी प्रयास निरर्थक साबित हुए। जब कालभैरव काशी में आकर अपने बाये हाथ को  गंगा नदी में डुबोये, तो उनके हाथ से सिर निकल गया, ब्रह्मा जी को मोक्ष की प्राप्ति हुयी और कालभैरव मुक्त हो गए ।

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